वाशिंगटन। पश्चिम एशिया में ईरान से जुड़े बढ़ते तनाव ने एक बार फिर वैश्विक महाशक्तियों अमेरिका और चीन के बीच रणनीतिक प्रतिद्वंद्विता को बेहद तेज कर दिया है। खाड़ी क्षेत्र में बढ़ती सैन्य गतिविधियों, समुद्री सुरक्षा को लेकर गहराती चिंताओं और ऊर्जा आपूर्ति पर मंडराते खतरे ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंताएं बढ़ा दी हैं। हालांकि, रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा हालात भले ही गंभीर हैं, लेकिन इसे 'तीसरे विश्व युद्ध' की शुरुआत कहना फिलहाल जल्दबाजी होगा।

महाशक्तियों की टकराती रणनीतियां और सैन्य उपस्थिति

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका लंबे समय से खाड़ी क्षेत्र में अपनी मजबूत सैन्य मौजूदगी बनाए हुए है। उसका साफ कहना है कि वह अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा और अपने सहयोगी देशों के हितों की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। दूसरी ओर, चीन पश्चिम एशिया से बड़े पैमाने पर कच्चे तेल का आयात करता है और इस क्षेत्र में स्थिरता को अपनी ऊर्जा सुरक्षा तथा आर्थिक हितों के लिए बेहद अहम मानता है। यही वजह है कि दोनों महाशक्तियां इस गंभीर संकट पर बिल्कुल अलग-अलग रणनीतियां अपनाती नजर आ रही हैं।

कूटनीतिक और आर्थिक मोर्चे पर चीन की बढ़ती भूमिका

जानकारों के मुताबिक, चीन अब पश्चिम एशिया में अपनी आर्थिक और कूटनीतिक भूमिका को लगातार बढ़ा रहा है। ईरान के साथ उसका दीर्घकालिक आर्थिक सहयोग समझौता और ऊर्जा संबंध इस क्षेत्र में उसकी रणनीतिक मौजूदगी को मजबूत करते हैं। इसके विपरीत, अमेरिका के सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), कतर और अन्य सहयोगी देशों के साथ दशकों पुराने सुरक्षा गठबंधन हैं। इस कारण कई मामलों में दोनों महाशक्तियों के हित एक-दूसरे से सीधे टकराते दिखाई देते हैं, हालांकि दोनों ही देश खुली सैन्य भिड़ंत से बचने की कोशिश करते रहे हैं।

प्रत्यक्ष युद्ध के बजाय कूटनीतिक और आर्थिक टकराव

रक्षा और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का स्पष्ट कहना है कि वर्तमान स्थिति को अमेरिका और चीन के बीच प्रत्यक्ष युद्ध के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। दोनों देश वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक-दूसरे से बहुत गहराई से जुड़े हुए हैं, जिसके कारण किसी भी बड़े युद्ध की कीमत दोनों को भारी आर्थिक नुकसान के रूप में चुकानी पड़ सकती है। इसलिए प्रत्यक्ष जंग के बजाय कूटनीतिक दबाव, आर्थिक प्रतिबंध, सैन्य तैनाती और क्षेत्रीय सहयोगियों के माध्यम से एक-दूसरे पर प्रभाव बढ़ाने की रणनीति अधिक संभावित मानी जा रही है।

विश्व युद्ध की संभावना सीमित, मगर वैश्विक बाजारों पर पड़ेगा गहरा असर

भू-राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि खाड़ी क्षेत्र में जारी संकट निश्चित रूप से अंतरराष्ट्रीय राजनीति के लिए एक गंभीर चुनौती है, लेकिन इसके विश्व युद्ध में बदलने की संभावना बेहद सीमित है। व्यापक वैश्विक टकराव का खतरा तभी बढ़ सकता है जब यह क्षेत्रीय संघर्ष पूरी तरह नियंत्रण से बाहर हो जाए और कई देशों की सेनाएं इसमें सीधे तौर पर शामिल हो जाएं। फिलहाल दुनिया की निगाहें कूटनीतिक प्रयासों पर टिकी हुई हैं, क्योंकि इस क्षेत्र में किसी भी बड़े सैन्य संघर्ष का सीधा असर वैश्विक ऊर्जा बाजार, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था पर होना तय है।