परेव वास्तव में पड़ाव का अपभ्रंश है जिसका अर्थ है अस्थायी आश्रय स्थल। माना जाता है कि श्री राम, लक्ष्मण जी तथा विश्वामित्र जी ने कुछ समय के लिए यहां अपने लिए एक अस्थायी आश्रय स्थल बना कर पड़ाव डाला था। यह स्थान कोइलवर पुल के पास स्थित है। निकट ही मोहनेश्वर महादेव का मंदिर है। कुछ लोगों का विचार है कि उन तीनों ने सोनभद्र नदी को त्रिगना घाट से ही पार किया था। इन दोनों स्थानों के बीच लगभग 5 किलोमीटर की दूरी है।

कार्य में कई महत्वपूर्ण जानकारियां मिली हैं फिर भी श्री राम वन गमन की तरह ही भौगोलिक स्थितियों में बहुत परिवर्तन हुआ है। अनेक स्थल लुप्त हो गए हैं फिर भी जो कुछ मिला उसके वर्णन से पूर्व शोध की सीमाओं की चर्चा करना उपयोगी रहेगा। ये सीमाएं इस प्रकार हैं :

1. सरयू जी का मार्ग बदलना : सरयू जी लगभग 40 कि.मी. उत्तर दिशा में चली गई हैं। मूल धारा के स्थान पर अब नदी की पतली सी धारा बहती है। कहीं-कहीं नदी के पेटे तथा विशाल झील व दलदली भूमि मिलती है। पुराने मार्ग पर बने अधिकांश चिन्ह लुप्त हो गए हैं। अत: मार्ग खोजने में कठिनाई रही है। प्राचीन मूल धारा को अब पुरानी सरयू अथवा छोटी सरयू कहते हैं। सरयू तथा पुरानी सरयू का अलगाव बिंदू कहा है। परिस्थितियों के कारणं खोजा नहीं जा सका।

कुछ लोगों ने अलगाव बिदू कहीं फैजाबाद जिले में बताया किन्तु इसकी पुष्टि नहीं हो सकी। अधिकांश लोगों का मत है कि अलगाव बिंदू रोनापार तथा लाट घाट के बीच कहीं है। इतना तो निश्चित है कि पुरानी सरयू लाटघाट, मोहम्मदपुर, अजमत गढ़, मऊ, उमापुर, रणवीरपुर, बहादुर गंज, सलामतपुर, लखनेश्वर डीह होती हुई बलिया में गंगा जी में मिलती है।

चूंकि गंगा जी भी मार्ग बदल रही हैं अत: अनुमान है कि इस नदी का रामायण काल में सरयू से संगम गाजीपुर तथा शेरपुर के बीच कहीं होता था। तभी बक्सर का मार्ग ठीक बनता है। पुरानी सरयू का मऊ के पास टोंस नदी में संगम हो जाता है और सरकारी विभाग तथा 'अंग्रेजी दां' लोग इसे टोंस कहते हैं किन्तु जनता आज भी इसे सरयू जी कहती है।

2. गंगा जी का मार्ग बदलना : सरयू जी की तरह गंगा जी ने भी अपना मार्ग बदला है। गंगा जी दक्षिण दिशा में बढ़ रही हैं कितना मार्ग बदला कहा नहीं जा सकता।

एक कठिनाई यह भी है कि वाल्मीकि रामायण के अनुसार रामायण काल में गंगा जी की तीन धाराएं समुद्र में पहुंचती थीं। अब केवल एक धारा बची है। श्री राम किस धारा पर चले थे पता नहीं चलता। यदि वर्तमान धारा के साथ चलें तो भी मार्ग बदलने के कारण लुप्त हुए स्थलों को खोज पाना असंभव सा है।

3. सोनभद्र का मार्ग : उपर्युक्त दोनों नदियों की तरह सोनभद्र ने भी मार्ग बदला है। वाल्मीकि जी के अनुसार सोनभद्र पार करने के बाद लम्बी दूरी तय करके उन्हें गंगा जी के दर्शन होते हैं। वर्तमान परिस्थितियों में सोनभद्र पार करने के थोड़ी दूरी पर ही गंगा जी मिल जाती हैं।

4. गंगा जी व सरयू जी का संगम : लगता है कि नदियों के मार्ग बहुत बदल लेने से इनका संगम रामायण कालीन संगम स्थल से लगभग 100 कि.मी. आगे चला गया है। विश्वामित्र जी का आश्रम सिद्धाश्रम के नाम से प्राचीन क्षेत्र बक्सर है। मानचित्र को देखें तो पता चलता है कि यदि वर्तमान संगम से सिद्धाश्रम आएं तो 100 कि.मी. से भी अधिक मार्ग से विपरीत दिशा (पूर्व से पश्चिम) में चलना पड़ता है।

5. अन्य कारण : उपर्युक्त के अतिरिक्त भी बहुत से भौगोलिक परिवर्तन हुए हैं जिनसे शोध कार्य में भ्रम हो जाता है।

दुरुह मार्ग, मार्ग में असुरक्षा की भावना, सड़कों की शोचनीय दशा, उपयुक्त विद्वानों व संतों का न मिलना आदि अनेक कारण हैं जिनसे यात्रा मार्ग खोजने में कठिनाइयां रही हैं। उपर्युक्त सीमाओं में शोध करते हुए जो कुछ मिला इसे ही ईश्वर का प्रसाद समझकर सभी राम भक्तों का भाग उन्हें पहुंचाया जा रहा है। (क्रमश:)

त्रिगना घाट, सोनभद्र, पटना (बिहार)
लोक मान्यता के अनुसार श्री राम, लक्ष्मण जी तथा विश्वामित्र जी ने त्रिगना घाट से महानद सोनभद्र को पार किया था। यहां प्राचीन मूर्तियां खुदाई में मिली हैं। यह स्थान पुल से लगभग 8 कि.मी. दूर पड़ता है।

गौतम आश्रम अहियारी (गौतमी गंगा), दरभंगा (बिहार)
वाल्मीकि रामायण के अनुसार गौतम मुनि का आश्रम मिथिला के एक उपवन में था जहां अहिल्या शिला रूप में थी। यह स्थान अब अहियारी के नाम से प्रसिद्ध है। पहले यहां तपोवन था। अब भी यहां चारों दिशाओं में चार ऋषियों के आश्रम हैं। याज्ञवल्क (जगवन), शृंगी (सींगिया), भ्रंगी (भैरवा) तथा गौतम ऋषि का आश्रम स्थित है। आज भी इस मंदिर में बहुत श्रद्धा है तथा नए कार्य आरंभ करने से पूर्व तथा संस्कार होने से पूर्व लोग अहिल्या मां से आशीर्वाद लेने आते हैं। यह आश्रम दरभंगा से पश्चिम उत्तर दिशा में लगभग 25 कि.मी. दूर है।