हमारे पौराणिक शास्त्रों व हिन्दू धर्म में अमावस्या तिथि को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। हिंदू कैलेंडर यानी पंचांग में एक साल में कुल 12 अमावस्या होती हैं। हर महीने के कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि अमावस्या कहलाती है। धर्म ग्रंथों में इसे पर्व भी कहा गया है। अगर साधारण शब्दों में हम कहें तो जिस दिन चंद्रमा दिखाई नहीं देता है, उस दिन को अमावस्या कहते हैं। अमावस्या को पूर्वजों का दिन भी कहा जाता है। दिन के अनुसार पड़ने वाली अमावस्या के अलग-अलग नाम होते हैं। जैसे सोमवार को पड़ने वाले अमावस्या को सोमवती अमावस्या कहते हैं । उसी तरह शनिवार को पड़ने वाली अमावस्या को शनि अमावस्या कहते हैं। पितृदेव को अमावस्या का स्वामी माना जाता है इसीलिए इस दिन पितरों को याद करने और उनकी आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध कर्म या पूजा -पाठ करना अनुकूल माना जाता है।

चंद्र मास के अनुसार आषाढ़ वर्ष का चौथा माह होता है। इसके पूर्ण होने के बाद वर्षा ऋतु की शुरुआत हो जाती है। हिंदू धर्म में अमावस्या तिथि की तरह आषाढ़ मास की अमावस्या भी बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस बार आषाढ़ मास की अमावस्या तिथि 9 जुलाई दिन शुक्रवार को पड़ रही है। आषाढ़ माह की अमावस्या तिथि को हलहारिणी अमावस्या और अषाढ़ी अमावस्या भी कहते हैं। हलहारिणी अमावस्या के दिन हल और खेती में उपयोग होने वाले उपकरणों की पूजा की जाती है। इस तिथि पर किसान विधि-विधान से हल पूजन करके ईश्वर से फसल हरी-भरी बनी रहने की कामना करते हैं। बहुत से लोग अपने पूर्वजों के नाम से हवन करते है और प्रसाद आदि चढ़ाते हैं। इस दिन पितरों की शांति के लिए किया गया स्नान-दान और तर्पण उत्तम माना जाता है। इस लिए अमावस्या के दिन पवित्र नदी में स्नान करने और तर्पण के साथ दान पुण्य करने तथा व्रत रखने की परंपरा है। मान्यता है कि ऐसा करने से पितृ बहुत खुश होते हैं और उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है।

आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि 9 जुलाई को सुबह 5 बजकर 16 मिनट पर लगेगी और 10 जुलाई दिन शनिवार को सुबह 06 बजकर 46 मिनट पर समाप्त होगी। इसलिए आषाढ़ अमावस्या का व्रत 09 जुलाई शुक्रवार को रखा जाएगा। व्रत का पारण 10 जुलाई को किया जाएगा। अमावस्या के दिन सुबह जल्दी उठें। इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में किसी पवित्र नदी में स्नान करें। सूर्योदय के समय भगवान सूर्यदेव को जल का अर्घ्य दें। इस दिन कर्मकांड के साथ अपने पितरों का तर्पण करें। पितरों की आत्मा की शांति के लिए व्रत रखें। पूरे दिन फलाहार व्रत रखकर जरूरत मंद लोगों को यथा शक्ति दान दें। मान्यता है कि इस दिन शाम को पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है। दीपक जलाने के बाद पितरों का स्मरण करें. जरूरतमंदों को दान-दक्षिणा दें। ब्राह्मणों को भोजन कराएं। इससे पितृ भी प्रसन्न होते हैं और आपके ऊपर पितरों का आशीर्वाद बना रहता है।