17 सितंबर| शुक्रवार को पूरे देश में परिवर्तनीय एकादशी मनाई जाएगी। इसे जलझूलनी डोल ग्यारस एकादशी भी कहा जाता है। इसी दिन से भगवान गणेश के विसर्जन की शुरुआत होती हैं, जो अनंत चतुर्दशी तक चलती है। देव शयनी एकादशी में भगवान विष्णु 4 महीने के लिए सो जाते हैं। सोए हुए भगवान विष्णु देव उठनी एकादशी के दिन जागृत होते हैं, लेकिन इन चार महीनों के बीच एक ऐसा समय आता है, जब भगवान विष्णु सोए हुए करवट बदलते हैं। बालाजी धाम काली माता मंदिर के ज्योतिषाचार्य पंडित सतीश सोनी के अनुसार भादाै मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन भगवान विष्णु करवट लेते हैं। इस दिन भगवान विष्णु के 10 अवतारों में से एक वामन भगवान के रूप में पूजा की जाती है। हिंदू पंचांग में एकादशी तिथि 16 सितंबर दिन गुरुवार को सुबह 9:37 से शुरू होगी और 17 सितंबर दिन शुक्रवार को सुबह 8:08 तक रहेगी। इसके बाद द्वादशी तिथि का प्रारंभ होगा। पंचांग में भादाै शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 16 सितंबर को पूरे दिन रहेगी, लेकिन इस दिन सूर्योदय एकादशी तिथि के पूर्व हुआ है। ऐसे में उदया तिथि की मान्यता के अनुसार जलझूलनी परिवर्तन एकादशी का व्रत 17 सितंबर के दिन शुक्रवार को रखना शास्त्र सम्मत होगा। परिवर्तन एकादशी का व्रत करने से बाजपेई यज्ञ के समान फल की प्राप्ति होगी तथा पापों का नाश होगा और वहीं मोक्ष की प्राप्ति के साथ समस्त मनोकामना पूर्ण होगी। एकादशी के दिन दान करने का विशेष महत्व होता है। इस दिन चावल, शक्कर, दही, चांदी की वस्तु का दान करना अति शुभ फलदाई होता है। सोनी के अनुसार इस दिन सूर्यदेव अपनी राशि को परिवर्तन करके कन्या राशि में प्रवेश करेंगे । इससे कन्या संक्रांति का निर्माण होगा। ज्योतिष में जब सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करते हैं तो उसे संक्रांति कहा जाता है।