किशोरावस्था में प्रवेश करते ही परिजनों द्वारा किशोरियों पर तरह-तरह के प्रतिबंध लगा दिए जाते हैं। उनकी आजादी व स्वतंत्रता समाप्त हो जाती है। वे अब घर की चारदीवारी में कैद होकर रह जाती हैं, जबकि लड़कों पर इस तरह से कोई प्रतिबंध नहीं लगाए जाते। हमउम्र भाई को पूरी छूट और स्वयं पर कठोर नियंत्रण लगे होने से किशोरियां तनावग्रस्त रहने लगती हैं। 
यौवन की दहलीज पर खड़ी किशोरियां जब सड़कों पर निकलती हैं, स्कूल जाती-आती हैं, तो मनचले उन पर फिकरे कसते हैं। यह एक ऐसी बात है जिसे न तो वे अपने परिजन को बताती हैं, न सखी-सहेलियों को और मन ही मन सदैव किसी अप्रिय हादसे की आशंका से भयभीत रहती हैं। किशोरियों के तनावग्रस्त रहने में कई बार उनके माता-पिता भी बड़ी भूमिका निभाते हैं।  
अपने बच्चे को कलेक्टर, कमिश्नर, डाक्टर इंजीनियर, प्रोफेसर आदि बनाने के सपने देखने वाले माता-पिता उन्हें साकार करने के लिए उनके पीछे ही लगे रहते हैं। ऐसा वे उनकी भलाई के लिए ही कर रहे होते हैं लेकिन नसीहत देने से पूर्व उन्हें किशोरी की क्षमता पर भी ध्यान देना चाहिए। कई बार यह भी तनाव बढ़ाने का कारण सिद्ध होता है। 
माता-पिता की आकांक्षा की खातिर वे चिंता एवं तनाव में पड़ जाती हैं और उनके सुकोमल चेहरे से हंसी, मुस्कान और खुशी के भाव नदारद हो जाते हैं और भय, चिंता और तनाव के भाव स्पष्ट दिखाई देने लगते हैं। जो किशोरी तनावग्रस्त रहती है, वह हर समय डरी एवं सहमी हुई रहती है। उसका सामाजिक दायरा सिमट जाता है। यहां तक कि अपने हम उम्र के या सखी सहेलियों के साथ हंस बोल भी नहीं पाती। 
किशोरियों में  अवसाद का प्रमुख कारण असुरक्षा की भावना है। यह असुरक्षा उन्हें अपने घर में भी महसूस हो सकती है और स्कूल या कालेज में भी। कई अभिभावकों को अपने बच्चों के लिए समय ही नहीं मिलता। पिता को अपने व्यवसाय, दोस्तों और क्लबों से फुर्सत नहीं होती और मां को किटी पार्टी, सखी सहेलियों से माता-पिता देर रात को घर लौटते हैं तब तक किशोरी सो जाती है। परिणामस्वरूप उनकी गुत्थियां उलझती जाती हैं, तनाव बढ़ता जाता है।