जिंदगी में मां, महात्मा और परमात्मा से बढ़कर और कुछ भी नहीं है। जीवन में तीन आशीर्वाद जरूरी हैं-बचपन में मां का, जवानी में महात्मा का और बुढ़ापे में परमात्मा का। मां बचपन को संभाल देती हैं, जवानी में नीयत बिगड़े तो उपदेश देकर महात्मा सुधार देता है और बुढ़ापे में मौत बिगड़े तो परमात्मा संभाल लेता है। मां, महात्मा और परमात्मा ही जिंदगी है। धर्म, पुराण और इतिहास में से अगर ये तीन शब्द निकाल दें तो वे मात्र कागजों के पुङ्क्षलदे ही रह जाते हैं।

सत्य एक है
सत्य का रास्ता कठिन है। इस रास्ते पर हजार चलने की सोचते हैं मगर सौ ही चल पाते हैं और जो सौ चल देते हैं उनमें केवल दस ही पहुंच पाते हैं। जो दस पहुंचते हैं, उनमें भी सिर्फ एक ही सत्य को उपलब्ध हो पाता है, नौ किनारे पर आकर डूब जाते हैं। तभी तो कहते हैं कि सत्य एक है और याद रखें : सत्य परेशान तो हो सकता है, लेकिन पराजित नहीं।

असली लक्ष्मी
सूर्योदय के साथ ही बिस्तर छोड़ देना चाहिए, ऐसा न करने से सिर पर पाप चढ़ता है। महिलाएं जो घर की लक्ष्मी हैं, इनको सूर्योदय के साथ ही उठ जाना चाहिए। लक्ष्मण थोड़ी देर से उठे तो एक बार चल जाएगा, पर लक्ष्मी का देर से उठना बिल्कुल नहीं चलेगा। जिन घर-परिवारों में लक्ष्मी देर सुबह तक सोई पड़ी रहती है, उनकी 'असली-लक्ष्मी' रूठ जाया करती है और घर छोड़कर चली जाया करती है।

अमानत को अमानत ही समझें
दुनिया में तुम्हारा अपना कोई नहीं है। जो कुछ भी तुम्हारा है और तुम्हारे पास है वह बतौर अमानत है। बेटा है तो वह बहू की अमानत है। बेटी है तो वह दामाद की अमानत है। शरीर श्मशान की और जिंदगी मौत की अमानत है। तुम देखना: एक दिन बेटा बहू का हो जाएगा, बेटी को दामाद ले जाएगा, शरीर श्मशान की राख में मिल जाएगा और जिंदगी मौत से हार जाएगी। तो अमानत को अमानत समझकर ही उनकी सार-संभाल करो, उस पर मलकीयत का ठप्पा मत लगा देना।

पानी की लकीर जैसा जीवन
पानी पर खींची गई लकीर की कोई उम्र नहीं होती। पता नहीं कब कूच करने पर नगाड़ा बज जाए। अत: सौ काम छोड़ कर सत्संग में बैठना चाहिए और हजार काम छोड़कर धर्म ध्यान करना चाहिए। अगर 'आज' ऐसा नहीं किया तो 'कल' बहुत बुरा होगा। सोमवार को जन्म हुआ, मंगलवार को बड़े हुए, बुधवार को विवाह हुआ, वीरवार को बच्चे हुए, शुक्रवार को बीमार पड़ गए, शनिवार को अस्पताल गए और रविवार को चल बसे-मैं पूछता हूं, क्या यही जिंदगी है?